प्राचीन शक्तिवर्धक योग के महान शक्तिपुरुष: प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू – जीवन परिचय, शक्ति-प्रदर्शन, स्वतंत्रता आंदोलन और विरासत

संक्षेप में: प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू भारत के महान शक्तिपुरुषों में से एक थे, जिन्हें “इंडियन हरक्यूलिस” और “कलियुग भीम” के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपने अद्भुत शक्ति-प्रदर्शनों, भारतीय शारीरिक संस्कृति के प्रचार तथा स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन के माध्यम से भारतीय शक्ति परंपरा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।

प्राचीन शक्तिवर्धक योग और प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू

भारत की प्राचीन शक्तिवर्धक योग व्यायाम पद्धति केवल शरीर को बलवान बनाने की प्रणाली नहीं थी, बल्कि यह साहस, अनुशासन, श्वास-नियंत्रण, सहनशक्ति और शरीर-साधना का एक समग्र मार्ग थी। प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू उन महान व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने अपने जीवन और कार्यों के माध्यम से भारतीय शक्ति परंपरा को विश्वभर में सम्मान दिलाया।

उनकी असाधारण शारीरिक शक्ति, शरीर पर अद्भुत नियंत्रण और साहसिक शक्ति-प्रदर्शन उन्हें भारतीय शारीरिक संस्कृति के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं।

 

 

प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू कौन थे?

प्रोफेसर के. राममूर्ति (कोडी राममूर्ति) नायडू का जन्म 1882 में ब्रिटिश भारत के मद्रास प्रेसीडेंसी के श्रीकाकुलम ज़िले के वीराघट्टम गाँव (वर्तमान आंध्र प्रदेश) में हुआ था। वे एक तेलुगु तेलगा परिवार से थे।

बचपन और युवावस्था से ही उन्होंने व्यायाम, शक्ति-साधना और कुश्ती का कठोर अभ्यास प्रारंभ कर दिया था। वे सख्त शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन के समर्थक थे। आगे चलकर वे सर्कस और मंचीय प्रदर्शन के क्षेत्र में भी प्रसिद्ध हुए, जहाँ उन्होंने अपनी असाधारण शक्ति के माध्यम से लाखों लोगों को प्रभावित किया।

विश्वभर में वे “इंडियन हरक्यूलिस” तथा “कलियुग भीम” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

राममूर्ति नायडू को “इंडियन हरक्यूलिस” क्यों कहा जाता था?

राममूर्ति नायडू अपने समय के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपुरुषों में गिने जाते थे। उन्होंने अनेक ऐसे शक्ति-प्रदर्शन किए जिन्हें देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे।

उनके प्रमुख शक्ति-कारनामों में शामिल थे:

  • छाती और गर्दन की शक्ति से मोटी लोहे की जंजीरों को तोड़ देना।

  • विपरीत दिशाओं में खींची जा रही दो मोटर कारों को रोक देना।

  • आधा इंच मोटी लोहे की जंजीरों को तोड़ देना।

  • अपने सीने पर हाथी का भार संतुलित करना।

  • अपनी छाती को सामान्य अवस्था से लगभग 5–6 इंच तक फैलाना।

ये प्रदर्शन केवल मांसपेशियों की शक्ति का परिणाम नहीं थे, बल्कि वर्षों की साधना, श्वास-नियंत्रण और शरीर पर अद्भुत अधिकार का प्रमाण भी थे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में शक्ति प्रदर्शन

राममूर्ति नायडू ने इलाहाबाद में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भी अपने शक्ति-प्रदर्शन प्रस्तुत किए। उनके प्रदर्शन ने उपस्थित लोगों को अत्यंत प्रभावित किया।

पंडित मदन मोहन मालवीय उनके कौशल से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने राममूर्ति को विदेशों में भारतीय शक्ति परंपरा का प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसी प्रेरणा से उनकी टीम को लंदन भेजा गया और इसके बाद उन्होंने भारत तथा विदेशों में व्यापक यात्राएँ कीं।

1911 का लंदन प्रदर्शन और विश्वव्यापी प्रसिद्धि

1911 में लंदन में आयोजित उनके कार्यक्रम विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। इस अवसर पर उन्होंने अपनी छाती पर एक मजबूत तख्ता रखवाया और उसके ऊपर से लगभग तीन टन (लगभग 2722 किलोग्राम) वज़न के हाथी को गुजरवाकर अपनी असाधारण शक्ति का प्रदर्शन किया।

यह प्रदर्शन उस समय विश्वभर में चर्चा का विषय बन गया।

उनकी अद्भुत शक्ति से प्रभावित होकर किंग जॉर्ज पंचम और रानी मैरी ने उन्हें बकिंघम पैलेस में आमंत्रित किया। उनके शक्ति-प्रदर्शन को देखकर उन्हें “Indian Hercules” की उपाधि प्रदान की गई। कहा जाता है कि वे पहले भारतीय थे जिन्हें इस प्रकार का विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।

इसी काल के बाद वे “कलियुग भीम” के नाम से भी व्यापक रूप से प्रसिद्ध हो गए।

यूरोप में राममूर्ति नायडू की लोकप्रियता

राममूर्ति नायडू की ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और स्पेन सहित अनेक यूरोपीय देशों में प्रदर्शन किए।

स्पेन में उनसे बैल-युद्ध के अखाड़े में उतरने का आग्रह किया गया। यद्यपि उन्हें बैल-युद्ध का कोई अनुभव नहीं था, फिर भी उन्होंने चुनौती स्वीकार की।

कहा जाता है कि उन्होंने बैल के सींग पकड़कर उसे नियंत्रित कर लिया और अपनी अद्भुत शक्ति, साहस तथा आत्मविश्वास का परिचय दिया। यह घटना उनके व्यक्तित्व की निर्भीकता को दर्शाती है।

श्वास-नियंत्रण और आंतरिक शक्ति का अद्भुत उदाहरण

राममूर्ति नायडू के बारे में कहा जाता है कि वे अपनी छाती को सामान्य अवस्था से 5–6 इंच तक फैला सकते थे।यह केवल शारीरिक बल का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि श्वास-नियंत्रण, फेफड़ों की क्षमता और शरीर पर असाधारण नियंत्रण का भी उदाहरण था। यही कारण है कि उन्हें भारतीय शरीर-साधना और प्राचीन शक्तिवर्धक योग की परंपरा का एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माना जाता है।

स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

राममूर्ति नायडू का जीवन केवल शक्ति-प्रदर्शनों तक सीमित नहीं था।

वे डी. चंद्रय्या नायडू के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित हुए, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी युवाओं को संगठित करने का कार्य करते थे।

राममूर्ति ने अपनी सर्कस कंपनी और कार्यक्रमों से पर्याप्त धन अर्जित किया, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा समाज सेवा और राष्ट्रीय उद्देश्यों के लिए समर्पित किया। उन्होंने अपनी प्रसिद्धि और संसाधनों का उपयोग स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में भी किया।

 

भारतीय युवाओं के लिए उनका अधूरा सपना

राममूर्ति नायडू चाहते थे कि भारत के युवाओं के लिए एक ऐसा व्यायामशाला और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाए जहाँ शक्ति, कुश्ती, शारीरिक संस्कृति और शरीर-साधना का व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जा सके।

उनका विश्वास था कि भारत की शक्ति-परंपरा को पुनर्जीवित करना आवश्यक है और युवाओं में साहस, अनुशासन तथा शारीरिक क्षमता का विकास होना चाहिए।

दुर्भाग्यवश संसाधनों और परिस्थितियों के अभाव में वे अपने इस स्वप्न को साकार नहीं कर सके। इसे उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण अधूरी इच्छा माना जाता है।

जीवन के अंतिम वर्ष और निधन

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में राममूर्ति नायडू उड़ीसा की बलांगीर रियासत के शासक के संरक्षण में रहने लगे थे। वर्षों तक चले कठिन शक्ति-प्रदर्शनों, यात्राओं और निरंतर शारीरिक परिश्रम के बाद उनका जीवन अपेक्षाकृत शांत हो गया था।

16 जनवरी 1942 को संक्रांति उत्सव के समय उड़ीसा में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु लगभग 59 से 60 वर्ष के बीच थी।

ऐतिहासिक अभिलेखों में उनके निधन के सटीक कारण का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, किंतु यह माना जाता है कि लंबे समय तक किए गए अत्यंत कठिन शक्ति-प्रदर्शनों और शारीरिक परिश्रम का प्रभाव उनके शरीर पर पड़ा था।

 

राममूर्ति नायडू की विरासत

राममूर्ति नायडू की मृत्यु के बाद भी उनकी स्मृति और योगदान जीवित रहे।

उनके सम्मान में:

  • विशाखापत्तनम बीच रोड पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई।

  • उनके जन्मस्थान वीराघट्टम में उनकी प्रतिमा स्थापित है।

  • श्रीकाकुलम स्थित “कोडी राममूर्ति स्टेडियम” का नाम उनके सम्मान में रखा गया।

ये स्मारक इस बात का प्रमाण हैं कि राममूर्ति केवल एक शक्तिशाली व्यक्ति नहीं थे, बल्कि भारतीय शक्ति-परंपरा, व्यायाम संस्कृति और शरीर-साधना के अमर प्रतीक बन चुके थे।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू कौन थे?

वे भारत के प्रसिद्ध शक्तिपुरुष, सर्कस कलाकार और शारीरिक संस्कृति के प्रचारक थे, जिन्हें “इंडियन हरक्यूलिस” और “कलियुग भीम” कहा जाता था।

राममूर्ति नायडू के सबसे प्रसिद्ध शक्ति-प्रदर्शन कौन से थे?

मोटी लोहे की जंजीरें तोड़ना, दो मोटर कारों को रोकना, तथा अपनी छाती पर हाथी का भार सहन करना उनके सबसे प्रसिद्ध कारनामों में शामिल हैं।

उन्हें “इंडियन हरक्यूलिस” की उपाधि कैसे मिली?

लंदन में उनके असाधारण शक्ति-प्रदर्शनों से प्रभावित होकर उन्हें “Indian Hercules” के नाम से सम्मानित किया गया।

क्या राममूर्ति नायडू स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे?

हाँ, उन्होंने अपनी प्रसिद्धि और संसाधनों का उपयोग भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में भी किया।

भारतीय शक्ति परंपरा में उनका क्या महत्व है?

उन्हें भारतीय शक्ति-परंपरा, शारीरिक संस्कृति, शरीर-साधना और प्राचीन शक्तिवर्धक योग के महान प्रतिनिधियों में गिना जाता है।

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निष्कर्ष

प्रोफेसर कोडी राममूर्ति नायडू केवल एक शक्तिशाली व्यक्ति नहीं थे, बल्कि भारतीय शक्ति-परंपरा, शारीरिक संस्कृति और प्राचीन शक्तिवर्धक योग के जीवंत प्रतीक थे। उन्होंने अपने अद्भुत शक्ति-प्रदर्शनों, अनुशासन, साहस और राष्ट्रप्रेम के माध्यम से यह सिद्ध किया कि शरीर-साधना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का भी माध्यम बन सकती है। भारतीय शक्ति परंपरा के इतिहास में उनका नाम सदैव सम्मान और गौरव के साथ लिया जाएगा।

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